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21 जून: साल का सबसे बड़ा दिन, परछाई भी छोड़ देगी साथ
एक साल में 365 दिन होते हैं, लेकिन एक दिन यानी 21 जून साल का सबसे बड़ा दिन होता है। इस दिन भारत सहित पूरे उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित सभी देशों में दिन बड़ा और रात छोटी होती है। पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाने के साथ अपने अक्ष पर भी घूमती है। जी हां, 21 जून को कुछ पल के लिए परछाई भी साथ छोड़ देती है।
मंगल पर भी धूल भरी आंधी, बंद हुआ नासा का रोवर 'ऑपरच्यूनिटी'
मंगल पर भीषण धूल भरी आंधी चलने से नासा का ऑपरच्यूनिटी रोवर ठप पड़ गया है। नासा की जेट प्रपल्शन लैबरेटरी में ऑपरच्यूनिटी के प्रॉजेक्ट मैनेजर जॉन कालास ने बताया कि ऑपरच्यूनिटी को मंगल ग्रह पर परसीवरेंस वैली नाम की जगह पर देखा गया है। रोबॉटिक यान से आखिरी बार 10 जून को संपर्क हुआ था। मंगल पर जीवन का पता लगाने के लिये ऑपरच्यूनिटी और स्पिरिट नामक दो रोबॉटिक यानों को वर्ष 2003 में प्रक्षेपित किया गया था।
धरती से दूर जा रहे हैं चंदा मामा, इसलिए हो रहे हैं लंबे दिन
चंद्रमा के पृथ्वी से दूर जाने के कारण हमारे ग्रह पर दिन लंबे होते जा रहे हैं। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि 1.4 अरब साल पहले धरती पर एक दिन महज 18 घंटे का होता था। पत्रिका प्रोसिडिंग्स ऑफ द नैशनल अकैडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित यह अध्ययन चंद्रमा से हमारे ग्रह के रिश्ते के गहरे इतिहास को पुन: स्थापित करता है।
मार्स की तरफ बढ़ रहे हैं NASA के छोटे सैटलाइट्स
नासा के इनसाइट मार्स लैंडर की निगरानी के लिए विकसित दुनिया के पहले छोटे उपग्रह सफलतापूर्वक लाल ग्रह की तरफ बढ़ गए हैं। वे मंगल की दिशा प्राप्त करने के लिए इस प्रणाली का उपयोग कर रहे हैं। यह अंतरिक्ष यान को प्रक्षेपण के बाद मंगल ग्रह की तरफ अपने पथ की दिशा में सुधार की अनुमति देता है। इन्हें मंगल के रास्ते में बढ़ने के दौरान इनसाइट का पीछा करने के लिए डिजाइन किया गया है।
स्पेस में पॉटी का क्या होता है? महिला ऐस्ट्रनॉट ने बताया अनुभव
नासा ऐस्ट्रनॉट पेगी विटसन ने अमेरिका के सभी अंतरिक्षयात्रियों में से सबसे ज्यादा समय अंतरिक्ष में बिताया है। विटसन कुल 665 दिन स्पेस में रही हैं, जो कि दुनिया की किसी भी महिला ऐस्ट्रनॉट द्वारा बिताया सबसे लंबा समय है। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान विटसन ने बताया है कि आखिरकार अंतरिक्ष में वे लोग बाथरूम कैसे जाते हैं और ऐस्ट्रनॉट्स को कैसे अपनी पॉटी बैग में पैक करनी पड़ती है।
अंटार्कटिका के बर्फ के नीचे मिला कुछ ऐसा, जानकर आप हो जाएंगे हैरान
शोधकर्ताओं ने अंटार्कटिका के हिम पर्वतों के नीचे छिपी पर्वत श्रृंखलाओं और ग्लेशियर के नीचे तीन गहरी घाटियों का पता लगाया है। एयरबोर्न रडार से लिए गए आंकड़ों से इस स्थान का वर्णन मिला कि कैसे बर्फ की चट्टानें पूर्व और पश्चिम अंटार्कटिका के बीच बहती हैं। ब्रिटेन में नोर्थम्ब्रिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पर्वत श्रृंखलाओं और ग्लेशियर के नीचे तीन गहरी घाटियों का पता लगाया।
चांद के दूरदराज के सिरे का पता लगाने के लिए चीन ने रिले सैटलाइट का परीक्षण किया
चांद के दूरदराज के रहस्यमय सिरे के बारे में जानकारी जुटाने के लिए चीन ने सोमवार को एक रिले उपग्रह का सफल परीक्षण किया। यह उपग्रह पृथ्वी और चीन के चंद्र अन्वेषण मिशन के बीच संवाद कायम करेगा। नेमड क्यूकीओ (मैपगी ब्रिज) नाम के इस उपग्रह का वजन 400 किलोग्राम है।
नासा के अंतरिक्षयात्रियों ने साढ़ें 6 घंटे का स्पेसवॉक किया
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के दो फ्लाइट इंजिनियरों ने बुधवार को अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन से बाहर इस साल का पांचवां स्पेसवॉक पूरा किया। समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने नासा के हवाले से बताया कि ड्रयू फ्यूस्टेल और रिकी ऑर्नोल्ड ने अमेरिकी पूर्वी समयानुसार रात 2 बजकर 10 मिनट पर अपना स्पेसवॉक पूरा किया, जो 6 घंटे और 31 मिनट में पूरा हुआ। दोनों ऐस्ट्रोनॉट्स ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से बाहर निकलकर मरम्मत और अपग्रेडेशन का काम पूरा किया।
अंतरिक्ष में पी सकेंगे बियर, बनाई गई ऐसी बोतल
अंतरिक्ष यात्री जल्द ही अंतरिक्ष में बीयर पी सकेंगे। ऐसा एक विशेष तरह की बोतल बनने की वजह से मुमकिन हो पाएगा। उस बोतल से बहुत कम गुरुत्वाकर्षण वाले क्षेत्र में भी ऐसा संभव है। फिलहाल नासा का कोई वैज्ञानिक अंतरिक्ष में बियर नहीं पी सकता। अपने डिजाइन्स को असल जिंदगी में लाने के लिए दोनों कंपनियां फिलहाल फंड जुटा रही हैं।
'धरती पर मानव प्रजाति के असर को दिखाने वाली वेबसाइट'
वायु प्रदूषण, व्यापार, वनोन्मूलन, आर्थिक असमानता व ऐसे ही अन्य प्रमुख कारकों के वहां पर असर को इसके जरिए जाना जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस पोर्टल के जरिए वैश्विक पर मानवीयता के असर को देखा जा सकता है। इस पहल का उद्देश्य लोगों को अपने जीवन व पृथ्वी पर उसके असर के बारे में सोच समझकर फैसला करने में मदद करना है।
मंगल की धरती पर हेलिकॉप्टर उड़ाएगा नासा, जानिए क्या है इस रोमांचक अाइडिए की वजह
नासा 2020 तक मंगल की सतह पर अगली पीढ़ी का का रोवर तैनात करना चाहती है। इसी दिशा में नासा मंगल की सतह पर एक रोवर्स भेजा है। नासा का कहना है कि मंगल की धरती पर हेलिकॉप्टर उड़ाने का आइडिया रोमांचक है। उनके अनुसार, मंगल की धरती पर हेलिकॉप्टर से कई तरह की बड़ी जानकारियां हमें मिलेंगी। इसमें रोवर फरवरी 2021 में मंगल की धरती पर पहुंचेगा।
मंगल के आसमान पर हेलिकॉप्टर उड़ाएगा नासा
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने शुक्रवार को बताया कि वह 2020 मिशन के तहत मंगल ग्रह पर छोटा हेलिकॉप्टर भेजेगा। मिशन के तहत नासा मंगल की सतह पर नेक्स्ट जेनरेशन रोवर भेजेगा। नासा के जेट प्रपलज़न लैबरेटरी में मार्स हेलिकॉप्टर प्रॉजेक्ट की मैनेजर मिमी आंग कहती हैं, 'धरती पर अभी तक हेलिकॉप्टर ने 40 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरी है।
वैज्ञानिकों का अनुमान, एक दिन यूं हमेशा के लिए 'अस्त' हो जाएगा सूरज
उनका कहना है कि आने वाले 10 अरब साल बाद सूरज इंटरस्टेलर गैर और धूल का एक चमकदार छल्ला बन जाएगा। हालांकि कई साल तक वैज्ञानिक इस बारे में निश्चित नहीं थे कि हमारी आकाशगंगा में मौजूद सूरज भी इसी तरह से खत्म हो जाएगा। इस संभावना का पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों की टीम ने डेटा-प्रारूप वाला एक नया ग्रह विकसित किया, जो किसी तारे के जीवनचक्र का अनुमान लगा सकता है।
आसमान से आफत लेकर आता है सोलर तूफान, अगले 24 घंटे में धरती पर मचाएगा तांडव
मौसम वैज्ञानिकों ने अगले 24 घंटे में भारत के कई जिलों में भयंकर तूफान की चेतावनी दी है। क्योंकि अगले 24 घंटों में अंतरिक्ष से भी एक भयंकर तूफान धरती से टकराएगा, जिसके कारण सैटेलाइट्स से लेकर मोबाइल, इंटरनेट जैसी सभी सुविधाएं ठप हो सकती हैं। अंतरिक्ष से आने वाला ये तूफान सीधे सूर्य से निकलेगा। नासा के अनुसार, सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण ये होता है कि सूर्य की सतह पर किस दिशा में विस्फोट हुआ है।
अगले 48 घंटे में सूरज फेंकेगा गर्म तूफान, सारे सिग्नल हो सकते हैं बंद
जानें क्यों आया उत्तर भारत में 'महा-तूफान' अगले 48 घंटे में पृथ्वी से सोलर स्टॉर्म टकराने की आशंका है। तमाम उपग्रह आधारित सेवाएं यानी मोबाइल सिग्नल, केबल नेटवर्क , जीपीएस नैविगेशन और सैटेलाइट आधारित तकनीक प्रभावित हो सकती है। एक्सप्रेस यूके की रिपोर्ट के मुताबिक सूर्य में एक कोरोनल होल खुलेगा। बता दें कि चुंबीय तूफान को सौर तूफान कहते हैं, जो सूर्य की सतह पर आए क्षणिक बदलाव से उत्पन्न होते हैं।
नासा का मार्स लैंडर 'इनसाइट' लॉन्च, मंगल पर आए भूकंप का लगाएगा पता
इसे मंगल पर मानव अभियान से पहले उसकी सतह पर उतरने और वहां आने वाले भूकंप को मापने के लिए डिजाइन किया गया है। यदि सब कुछ योजना के मुताबिक रहता है तो लैंडर 26 नवंबर को मंगल की सतह पर उतरेगा। ग्रीन ने कहा कि मंगल भूकंप का सामना करने में कितना सक्षम है? हमें जानने की जरूरत है। लैंडर के मंगल की सतह पर उतरने के बाद एक 'रोबॉटिक आर्म' सतह पर सेस्मोमीटर (भूकंपमापी उपकरण) लगाएगा।
इनसाइट एयरक्राफ्ट: और गहराई में जाकर मंगल की 'नब्ज' जांचेगा रोबॉट
इनसाइट एयरक्राफ्ट पहली बार मंगल की 'नब्ज' भी जांचेगा। क्योरिसिटी सहित नासा के पिछले रिसर्च की तरह पानी खोजने की बजाय इनसाइट मंगल की संरचना की स्टडी करेगा। ठंडे होने और सिकुड़ने की वजह से मंगल ग्रह पर क्रैक 6 और 7 की तीव्रता के भूकंप पैदा करते हैं। इनकी मदद से मंगल की थिकनेस जांचने की कोशिश की जाएगी। मंगल ग्रह कई मामलों में पृथ्वी के समान है।
मंगल के 'दिल' को पढ़ने की तैयारी में नासा, इसी हफ्ते भेजेगा पहला मिशन
मंगल की अंत: संरचना के अध्ययन के लिए नासा का पहला मिशन इसी हफ्ते उड़ान भरेगा। भूकंपीय जांच, भूमंडल को मापने के शास्त्र और ऊष्मा के आवागमन (इनसाइट) का इस्तेमाल करते हुए इंटीरियर एक्प्लोरेशन अमेरिका के वेस्ट कोस्ट से जाने वाला पहला ग्रहीय मिशन है। अमेरिका के अधिकतर अंतरग्रहीय मिशन फ्लोरिडा में कैनेडी स्पेस सेंटर (केएससी) से रवाना होते हैं जो देश के ईस्ट कोस्ट में स्थित है।
गजब! ध्वनि की 7 गुना रफ्तार को पार कर लेगी सुपरसॉनिक मिसाइल ब्रह्मोस
विश्व की सबसे तेज गति की क्रूज (नीचे उड़ने वाली कंप्यूटर निर्देशित) मिसाइल ब्रह्मोस उन्नत इंजन के साथ 10 साल में हाइपरसोनिक क्षमता हासिल कर लेगी और मैक-7 (ध्वनि की गति की 7 गुना की सीमा) को पार कर लेगी। इस मिसाइल को भारत- रूस ने मिलकर विकसित किया है। संयुक्त उपक्रम कंपनी ब्रह्मोस एयरोस्पेस के मुख्य कार्यकारी एवं प्रबंध निदेशक सुधीर मिश्रा ने कहा, 'हमें हाइपरसोनिक मिसाइल प्रणाली बनने में अभी से 7-10 साल लगेंगे.' अभी इसी रफ्तार ध्वनि की 2.8 गुना है।
3D प्रिंटर के जरिए खुद से आकार बदलने वाले प्लास्टिक उत्पाद विकसित
वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक की एक ऐसी समतल वस्तु बनाने के लिए किफायती 3 D प्रिंटर का इस्तेमाल किया है जिसे जब गर्म किया जाता है तो वह गुलाब, नाव और यहां तक कि खरगोश जैसे पहले से निर्धारित आकार में ढल जाती है। अमेरिका में कार्नेगी मेलोन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने बताया कि खुद-ब-खुद अपना आकार बदलने वाली प्लास्टिक की ये वस्तुएं मोड़कर रखने लायक फर्नीचर बनाने की दिशा में पहला कदम है।

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