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AIIMS में जिस पर अटल बिहारी वाजपेयी को रखा गया, क्या है वो लाइफ सपोर्ट सिस्टम?
एम्स के मुताबिक, अटल बिहारी वाजपेयी 11 जून को गुर्दा, नली में संक्रमण, पेशाब की नली और सीने में जकड़न की वजह से भर्ती कराए गए थे। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि जिस लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर उन्हें रखा गया है, वह क्या होता है। लाइफ सपोर्ट सिस्टम, शरीर के अंगों को कंट्रोल करने के लिए इस्तेमाल होने वाला एक प्रोसेस है। सीपीआर से शरीर में खून और ऑक्सीजन को भरपूर मात्रा में पहुंचाया जाता है, जिससे इनका सर्कुलेशन अच्छा हो सके।
इन देशों में धड़ल्ले से बिक रही हैं नकली और खराब गुणवत्ता वाली दवाएं
वैज्ञानिकों का कहना है कि मलेरिया जैसी जानलेवा बीमारी सहित दूसरी बीमारियों की नकली और खराब गुणवत्ता वाली दवाएं विकासशील देशों में धड़ल्ले से इस्तेमाल की जा रही हैं। वैज्ञानिकों ने साथ ही कहा कि कम एवं मध्यम आय वाले देशों से नमूने के तौर पर ली गयी दवाओं में से 13 प्रतिशत दवाएं खराब गुणवत्ता की थीं। शोधकर्ताओं ने पाया कि कम और मध्यम आय वाले देशों में 19 प्रतिशत मलेरिया रोधी और 12 प्रतिशत एंटीबॉयोटिक दवाएं नकली या खराब गुणवत्ता की थीं।
सुब्रमण्यम चंद्रशेखर ने नासा के सूर्य 'स्पर्श' मिशन के लिये तैयार की थी जमीन
सौर पवन' सूर्य से बाहर वेग से आने वाले आवेशित कणों या प्लाज़्मा की बौछार को नाम दिया गया है। अमेरिका से आज सूर्य के लिये रवाना हुए नासा के पार्कर सोलर प्रोब का उद्देश्य डॉक्टर यूजीन न्यूमैन पार्कर के शोध पत्र में प्रस्तावित 'सौर वायु' का अध्ययन करेगी। नासा का पार्कर सोलर प्रोब सूर्य के काफी करीब जाएगा और सूर्य की सतह के ऊपर के क्षेत्र (कोरोना) का अध्ययन करेगा। इससे पहले कोई अन्य प्रोब सूर्य के इतना करीब नहीं गया है।
आलस्‍य के कारण विलुप्त हो गए थे होमो-इरेक्टस
आलस और बदलते जलवायु के अनुकूल अपने आप को ढाल नहीं पाने के कारण प्रारंभिक मनुष्यों की विलुप्त प्रजाति होमो इरेक्टस का अस्तित्व खत्म हो गया था। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी (एएनयू) के कैरी शिप्टन ने कहा, ऐसा मालूम होता है कि वह ज्यादा मेहनत करने वाले लोग नहीं थे। शिप्टन ने कहा, मुझे ऐसा नहीं लगता कि वह बहुत अधिक खोज करने वाले होंगे।
नासा ने सूरज के करीब भेजा अपना यान, जानें मिशन में क्या होगा खास-Navbharat Times
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने सूरज पर अपना पहला मिशन 'पार्कर सोलर प्रोब' रवाना कर दिया है। एक गाड़ी के आकार का यह अंतरक्षियान सूरज की सतह के सबसे करीब 40 लाख मील की दूरी से गुजरेगा। इस मिशन का उद्देश्य यह जानना है कि किस तरह ऊर्जा और गर्मी सूरज के चारों ओर घेरा बनाकर रखती है। यह मिशन जब सूरज के सबसे करीब से गुजरेगा तो वहां का तापमान 2500 डिग्री सेल्सियस तक होगा।
मून मैन: बचपन में बस की टिकट के लिए बचाते थे पैसे, बड़े होकर बनाया मंगलयान
बड़े हुए तो किफायत बरतने की यह आदत ऐसी काम आई कि भारत के लिए नासा के मुकाबले दस गुना कम कीमत में मंगलयान बना डाला। बड़े होने पर आगे की पढ़ाई के लिए कोयंबटूर जाने लगे तो बस का किराया भरने की समस्या आन खड़ी हुई। अन्नादुरई पहले जाकर खड़े हो जाते थे और बस में अपने पांच छह साथियों के लिए सीट घेर लेते थे।
बातें सुनते-सुनते दूसरी प्रजातियों की 'भाषाएं' सीखती हैं चिड़ियां?-Navbharat Times
पक्षियों के लिए अपने पड़ोसियों की बातें सुनना और समझना जीवन या मौत के बीच का अंतर हो सकता है। क्या आपने कभी सोचा है कि पक्षी कैसे दूसरे पक्षियों की बातों को समझते होंगे? अब वैज्ञानिकों ने इसका खुलासा किया है। उनका मानना है कि दूसरे पक्षियों की बातें सुनकर कुछ भाषाएं सीखते हैं।
नासा के पहले कमर्शल यान के लिए सुनीता विलियम्स सहित 9 ऐस्ट्रनॉट्स चुने गए-Navbharat Times
नासा ने भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स सहित ऐसे 9 लोगों का नाम नामित किया है जो व्यावसायिक रूप से उपलब्ध रॉकेट और कैप्सूल के जरिए अंतरिक्ष जाने के पहले मिशन के लिए उड़ान भरेंगे। कसाडा की यह पहली अंतरिक्ष की उड़ान होगी, जबकि विलियम्स इससे पहले अंतरिक्ष स्टेशन में 321 दिन बीता चुकी हैं। नासा के अंतरिक्षयात्री रॉबर्ट बेहंकेन (48) और डगलस हर्ले (51) स्पेसएक्स के पहले ड्रैगन क्रू के तौर पर एकसाथ उड़ान भरेंगे।
भारतीय मूल के प्रोफेसर को ल्यूपस के संबंध में खोज करने पर मिले 20 लाख रुपए
ह्यूस्टनः भारतीय मूल के प्रोफेसर चंद्र मोहन और ह्यूस्टन विश्वविद्यालय के उनके दो सहकर्मियों ह्यूग रोय और लिली क्रान्ज को पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में 'ल्यूपस' के अधिक होने के संबंध में खोज करने के लिए 'नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ' की ओर से 20लाख रुपए का अनुदान दिया गया है। ल्यूपस एक ऐसी बीमारी है, जिसमें त्वचा पर सूजन आ जाती है और प्रतिरोधक क्षमता अपने ही स्वस्थ ऊतकों पर हमला कर देती है। मोहन अब आणविक तंत्र का अध्ययन करेंगे।
वैज्ञानिकों ने सौर मंडल के बाहर ग्रहों के समूह की पहचान की-Navbharat Times
वैज्ञानिकों ने हमारे सौर मंडल के बाहर ग्रहों के एक ऐसे समूह की पहचान की है जहां वही रासायनिक स्थितियां हैं जो शायद पृथ्वी पर जीवन का कारण बनी होंगी। ब्रिटेन में के शोधकर्ताओं ने पाया कि पृथ्वी जैसे एक चट्टानी ग्रह की सतह पर जीवन के विकास की संभावनाएं हैं और इनका संबंध ग्रह के होस्ट स्टार से है।
अर्थ ओवरशूट डे: 7 महीने में खत्म पृथ्वी के संसाधनों का साल भर का कोटा-Navbharat Times
1 अगस्त यानी बुधवार को अर्थ ओवरशूट डे है। इसका मतलब है कि हमारी पृथ्वी साल भर में जितने संसाधन पैदा करती है हमने उसको महज 7 महीनों में ही इस्तेमाल कर लिया है। एक बार फिर बता दें कि हमने साल भर के प्राकृतिक संसाधनों का कोटा सिर्फ 7 महीने में खत्म कर दिया है। हर साल ओवरशूट डे पीछे ही खिसकता जा रहा है यानी हम संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ाते जा रहे हैं। बीते साल 2 अगस्त को अर्थ ओवरशूट डे था।
15 साल में पहली बार इतने करीब होंगे धरती और मंगल ग्रह, आप देख पाएंगे लाइव स्ट्रीम
भले ही पृथ्वी और मंगल ग्रह बीते 15 साल में सबसे करीब होंगे, लेकिन उनके बीच की दूरी 57.6 मिलियन किलोमीटर होगी। 15 साल में पहली बार धरती का मंगल ग्रह के इतने करीब आना अपने आप एक यादगार खगोलीय घटना है। नासा की मानें तो 60,000 साल में पहली बार मंगल और धरती इतने करीब आए थे और ऐसी परिस्थिति फिर 2287 में हो सकती है।
ब्रह्मांड में सोच से ज्यादा रहने लायक ग्रह हैं: अध्ययन-Navbharat Times
अब तक जितने ग्रहों को रहने लायक समझा गया था ब्रह्मांड में उससे कहीं ज्यादा ऐसे ग्रह हैं जिनपर जीवन संभव है। एक नए अध्ययन में ऐसा दावा किया गया है। अमेरिका के पेनसिल्वानिया स्टेट यूनिवर्सिटी के भूवैज्ञानिकों ने सुझाया है कि जीवन की माकूल स्थितियों के लिए लंबे समय तक जरूरी मानी गईं टेक्टॉनिक प्लेटें असल में आवश्यक नहीं हैं। रहने लायक ग्रहों या अन्य ग्रहों पर जीवन की तलाश के वक्त वैज्ञानिकों ने वायुमंडलीय में कार्बन डायऑक्साइड के तत्वों को परखा।
हमें नींद क्‍यों नहीं आती? वजह जानना आपके लिए बेहद जरूरी है
इनसान अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा नींद में गुजारता है और अगर आप को चैन की नींद नहीं आती तो इसकी बहुत सी वजह हो सकती हैं। सर्वेक्षण के अनुसार कम वेतन पाने वालों को नींद कम आती है और अगर वेतन बढ़ जाए तो नींद भी बढ़ जाती है।
आज लगेगा Chandra Grahan, यहां देख सकते हैं Lunar Eclipse 2018 का लाइव स्ट्रीम
शुक्रवार देर रात आपका एक और अनोखे खगोलीय घटना से सामना होगा। हम बात कर रहे हैं चंद्र ग्रहण की। Lunar Eclipse 2018 आज रात होगा। बता दें कि अगले 100 साल तक का यह सबसे लंबा चंद्र ग्रहण है। भारत के लोग भी चंद्र ग्रहण 2018 को देख पाएंगे। लेकिन मॉनसून के कारण मौसम खलल डाल सकता है और मैट्रो शहर में तो प्रदूषण भी विलेन की भूमिका निभा सकता है। हालांकि, टेक्नोलॉजी की दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है।
लूनर एक्लिप्स 2018: सदी का सबसे लंबा चंद्र ग्रहण 27 जुलाई को, अब 2131 में होगा ऐसा
27 जुलाई को सदी का सबसे लंबा चंद्र ग्रहण लगने वाला है। यह चंद्रग्रहण 1 घंटे 16 मिनट तक रहा था लेकिन 27 जुलाई को लगने वाला चंद्रग्रहण इससे भी लंबा है। इसे उत्तरी अमेरिका के लोग नहीं देख पाएंगे क्योंकि जिस समय यह चंद्रग्रहण लगेगा इन देशों में दिन का समय होगा। नासा के मुताबिक, 27 जुलाई को ऑस्ट्रेलिया, एशिया, अफ्रीका, यूरोप और दक्षिण अमेरिका में चंद्रग्रहण देखा होगा।
....तो कभी चांद पर था एलियनों का बसेरा-Navbharat Times
क्या चांद पर कभी एलियनों का बसेरा हुआ करता था? वैज्ञानिकों के हालिया दावे को मानें तो ऐसा ही लगता है। उनका कहना है कि संभवतः उल्का पिंडों के ब्लास्ट के कारण एलियनों के रहने के अनुकूल वातावरण पैदा हुआ। 'द इंडिपेंडेंट' के मुताबिक, ग्रहों पर शोध करने वाले दो वरिष्ठ वैज्ञानिकों के मुताबिक, संभवतः चांद पर चार अरब साल पहले जीवन जीने योग्य माहौल था।
नासा तैयार, सूरज को 'छूने' भेजेगा मिशन-Navbharat Times
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा अपने पहले मिशन को सूरज तक भेजने के लिए पूरी तरह तैयार है। एक कार के आकार का यह अंतरिक्षयान सूरज की सतह से 40 लाख मील की दूरी से गुजरेगा। इससे पहले किसी भी अंतरिक्षयान ने इतना ताप और इतने प्रकाश का सामना नहीं किया है। पार्कर सोलर प्रोब 6 अगस्त को यूनाइटेड लॉन्च अलायंस डेल्टा 4 हैवी में सवार होकर उड़ान भरेगा।
धरती के नीचे दबा है हीरे का इतना बड़ा खजाना-Navbharat Times
वैज्ञानिकों ने धरती के नीचे हीरे के बड़े भंडार का पता लगाया है। मैसाच्युसट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के शोधकर्ताओं के मुताबिक, धरती के नीचे 10 खरब से हजार गुना ज्यादा हीरा दबा हुआ है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह हीरा धरती की सतह से करीब 90 से 150 मील अंदर है। अभी तक कोई इंसान इतनी गहराई तक नहीं पहुंच पाया है न तो इतनी गहरी खुदाई ही की जा सकी है।
धरती के इतिहास में वैज्ञानिकों ने खोजा 'मेघालय युग'-Navbharat Times
भूवैज्ञानिकों ने धरती के इतिहास में एक नए काल//युग की खोज की है और खासबात यह है कि इसका भारत के मेघालय से कनेक्शन है। वैज्ञानिकों ने आज से 4200 साल पहले शुरू हुए धरती के इतिहास को 'मेघालय काल' का नाम दिया है। इसने धरती के इतिहास में घटी सबसे छोटी जलवायु घटना को परिभाषित करने में मदद की। 4.6 अरब साल के धरती के इतिहास को कई कालखंडों में बांटा गया है।

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